Tuesday, November 15, 2011

बहुत याद आता है वो……


बहुत याद आता है वो मेरा पुराना घर…। इस बार दिवाली की छुट्टियों पर जब मायके गयी तो सब लोग पुराने घर से प्रस्थान कर चुके थे और नये बंगले मे निवास करने लगे थे। मैं वहाँ पँहुची तो अत्यंत प्रसन्न और उत्साहित थी, नया और बहुत बड़ा घर। पँहुचते ही पहले तो पूरा घर देखा, एक-एक कमरा देखा और मगन हो गयी अपने इस नये घर में। बेटा भी मगन था, खेलने के लिये पर्याप्त क्रीड़ा स्थल जो था।
कुछ दिन तक हम सब मगन रहे पटाखे फोड़ने मे, नये घर को प्रकाशवान करने में चार दिन कैसे निकल गये पता ही नहीं चला फिर अचानक ऐसा प्रतीत हुआ कि मन कुछ विचलित सा है, समझ मे नहीं आया क्या है।… वापसी का समय निकट आ रहा था तो सोचा बाज़ार हो आऊं, बाज़ार से लौट्ते समय रिक्शे वाले को पता बताया और रिक्शे में बैठ गयी, फिर अचानक रिक्शे वाले ने पूछा यहीं रोकना है या आगे, मैने देखा तो चौंक गयी रिक्शा वाला हमारे पुराने घर के पास खड़ा था, मैने बोला… "यहाँ नहीं जाना है", तो वो बोला… "आपने तो यही पता बताया था"। मैं आश्चर्य चकित थी, ये कैसे हो गया? "मैने ये पता कैसे बता दिया" ? ख़ैर रिक्शेवाले से माफ़ी मांगी और नये घर की ओर चलने को बोला। घर पहुँची तो माँ को इस घटना के बारे मेँ बताया, माँ ने बोला तुम्हे इतने वर्षोँ से आदत थी तो तुम्हारे मुँह से पुराने घर का पता निकल गया, इसमें इतना विचार करने वाली कोई बात नहीं है।
किन्तु मुझे उनके समझाने से संतुष्टि नहीं हुयी थी।… परन्तु तभी मुझे अपने मन की व्याकुलता का कारण समझ में आया, मुझे अपने पुराने घर की याद आ रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो मुझे करुण स्वर में पुकार रहा है, कि तुमने तो मुझे बिसरा ही दिया, पर मैं तुम्हे नहीं भूल पाया। देखो तुम्हे अपने द्वार तक लेके भी आया था…क्या तुम मुझसे मिलने एक बार भी नहीं आओगी? आ जाओ एक अन्तिम बार उस घर से मिल लो जो अब भी तुम्हारा है बाद में मैं तुम्हे मिलूंगा तो मुझमे वो अपनापन नहीं रहेगा क्योंकि तब मैं किसी और का हो जाऊँगा।
मेरा मन धिक्कार उठा आह! ये मैने क्या किया वापस जाने का समय आ गया था और मैं अभी तक एक बार भी अपने उस घर में नहीं गयी थी जिससे मुझे अत्यन्त प्रेम था। मैं उसी दिन माँ के साथ अपने प्यारे पुराने घर से मिलने पहुँच गयी। जब वहाँ पँहुची तो ऐसा प्रतीत हुआ वो घर कब से अपनी बाँहे फैलाये मुझे अपने गले से लगाने के लिये मेरी बाट जोह रहा था, वो घर जहाँ मैने अपना पूरा बचपन व्यतीत किया, जिस घर ने मुझे विवाह के पश्चात विदा किया था, जिस घर ने नवजात शिशु के रूप में मेरे पुत्र का स्वागत किया था, वो घर मुझसे मिलने व्याकुल था और मैने एक बार भी उसे याद नहीं किया…आह! धिक्कार है मुझ पर।
माँ ने घर का द्वार खोला तो लगा जैसे मुझ पर वज्रापात हुआ हो…पूरा घर खाली था, प्रतीत हो रहा था जैसे ये रिक्तता इस घर में नहीं मेरे ह्रदय में है। मैने जैसे ही पहला पग अंदर रखा, ऐसा लगा जैसे कि इस घर ने मुझे अपने ह्रदय के अंदर ले लिया है। मैने एक दृष्टी चारों ओर दौड़ाई तो लगा दीवारें नैनों में अश्रू लिये किन्तु अधरों पर मुस्कान लिये मेरा स्वागत कर रहीं हैं कह रहीं हैं कि देखो हम ही वो दीवारें हैं जिन्हे रंगने के लिये तुमने कितने ही रंगों को अस्वीकार किया था और तब जा कर हमारे लिये ये रंग चुना था, ध्यान से देखो हमने भी वो रंग बदले नहीं हैं। एक एक पग आगे बढ़ रहा था और मेरी स्मृतियों के द्वार खुलते जा रहे थे, और यह घर स्वयं मुझे पुरानी बातें बताता जा रहा था,…कह रहा था देखो मैं ही तो हूं जिसने तुम्हे मात्र वर्षा और धूप से बचाया ही नहीं वरन तुम्हे अपने भीतर ऐसे लिया था जैसे एक माँ अपने शिशु को अपनी गोद में लेती है स्मरण करो वो एक-एक क्षण जो तुमने यहाँ व्यतीत किये थे, तुम्हारा बचपन, वो बचपन के खेल, वो सब त्योहार जो तुमने यहाँ मनाये थे। क्या स्मरण है वो अल्हड़पन जिसमें कोई चिंता कोई द्वेश नहीं था?……स्मरण करो जब तुम और तुम्हारा भाई यहाँ दौड़-धूप करते थे तो तुम्हारे पग मेरे ऊपर पड़ कर मुझे थपकियाँ देते थे।
दूसरे कक्ष में पहुँची तो उसने कहा स्मरण करो…मैं वही कक्ष हूँ जिसमें तुम अपने परिवार के साथ बैठ कर ठिठोल किया करती थीं।…यहीं पर ठंड की ॠतु में तुम अपने आप को रज़ाई से ढंककर सारा दिन गाने सुना करतीं थीं, मुझे तुम्हारे ऊपर हंसी आती थी कि तुम्हें इतनी ठंड क्यों लगती है……आगे बढ़ते-बढ़ते रसोई में पँहुची……रसोई ने हँस कर कहा आओ अंदर आओ और अनुभव करो मैने अभी भी अपने भीतर तुम्हारे बनाये कुछ अच्छे भोजन की सुगंध और कुछ जले या विचित्र भोजनों की दुर्गंध जो तुम ना जाने टी वी के कौन-कौन से कार्यक्रमों से शोध कर लातीं थीं,… संभाल कर रखी है…तुम कदाचित उसे भूल गयी हो पर मैं नहीं भूली……मैं नम आँखों से मुस्कुराते हुये बाहर आ गयी। फिर घर ने कहा आओ हम मिलकर स्मरण करें उन प्यारे क्षणों को जो हमने साथ व्यतीत किये थे……स्मरण करो होली के त्योहार को जिसमें तुम तो बहुत जम कर होली खेलती थीं परंतु अगर कोई मेरी दीवारों पर भूल से भी रंग लगा देता था तो तुम उससे लड़ पड़ती थीं। कितना ध्यान रखती थीं तुम मेरा।……स्मरण करो वो दीवाली जब तुम बड़े जतन से मेरी सफ़ाई करती थीं…मैं और घरों से सुंदर दिखूँ इसलिये सुंदर-सुंदर राँगोली मेरे सामने डालती थीं…मेरे एक-एक कोने में बाहर एक-एक स्थान पर दिये रखकर तुम मुझे सबसे अधिक प्रकाशवान करने का प्रयत्न करती थीं।
क्या तुम्हे स्मरण है जब तुम्हारा विवाह हो रहा था मैं भी सम्पूर्ण हर्षोल्लास के साथ तुम्हारे हर कार्यक्रम में सम्मिलित था। सारे सदस्यों का ध्यान दूसरी व्यवस्थाओं मे था परंतु मेरा ध्यान तुम पर ही था मैं जानता था कि तुम कुछ ही दिनों मे विदा हो जाओगी फिर ना जाने कब आओगी……इसलिये तुम्हे मन भर के देखना चहता था……जब तुम विदा हो रही थीं ना जाने तुमने सुना हो या ना हो मैने अपने ह्रदय से तुम्हे अनगिनत आशीर्वाद दिये थे……तुम्हे मेरे आँसू दिखाई दिये या ना दिये परंतु सबके साथ मैं भी तुमसे बिछुड़ने के दुख में बहुत रोया था………स्मरण करो जब तुम नवजात शिशु के रूप मे अपने पुत्र को लेकर पहली बार मेरे द्वार पर खड़ी हुई थीं तो तुम्हारी माँ के साथ-साथ मैने भी तुम दोनो की नज़र उतारी थी……जैसे ही उस नन्हे से शिशु को लेकर तुमने पहला पग मेरे भीतर डाला मैने चारों ओर से अपने हर एक कोने से तुम्हारे पुत्र पर शुभाषीशों की वर्षा कर दी थीं…मेरी हर एक दीवारें उस पर आने वाली हर एक विपत्तियों को अपने ऊपर झेलने के लिये तैयार थीं।……जब वह अपने कोमल-कोमल चरणों से मेरे ऊपर दौड़ा करता था तो मैं निहाल होकर उसकी सारी बलायें अपने ऊपर ले लेता था……जब वह खेलते-खेलते गिर पड़ता था तो उससे अधिक पीड़ा मुझे होती थी……विश्वास करो अगर संभव होता तो मैं उसे थाम कर एक खरोंच भी नहीं आने देता……
स्मरण करो जब तुम्हे पता चला कि मुझे बेचा जाना है तो तुम बहुत उदास हो गयी थीं। तुम मुझसे बहुत दूर थीं फिर भी मैने तुम्हारे मुख की उदासी को देख लिया था।……मैने तुम्हारे मन कि व्यथा को, तुम्हारे भीतर के दुख को अनुभव कर लिया था। परंतु मैं कुछ कर नहीं पा रहा था……क्या करूँ लोग तो अंततः मुझे ईंट पत्थर से बना एक ढाँचा समझते हैं, जिसमें कोई प्राण नहीं होते, जिसमें कोई भवनायें नहीं होतीं। जिसे कोई भी कभी भी क्रय-विक्रय कर सकता है। "क्या तुम भी नये घर को पाकर मुझे एक ईंट पत्थर का ढाँचा समझकर भूल नहीं गयीं थीं?……बोलो क्या उत्तर है तुम्हारे पास?"……मेरे पास कोई उत्तर नहीं था और ना ही साहस था और प्रश्नों का सामना करने का तो नम आँखो के साथ छ्त की ओर दौड़ गयी।
छत पर पँहुची तो जामुन का पेड़ दिखाई दिया, उसने भी अपनी पत्तियों को लहराकर मेरा स्वागत किया और कहा क्या तुम्हे अब भी मेरा वो स्वाद स्मरण है? मैं उसे बताना चाहती थी कि तुम्हारे जामुनों के स्वाद को मैं कभी भी नहीं भूली थी… मुझे स्मरण है कि तुम्हारे रसीले जामुनो को एकत्रित करने के लिये हम सब कितना जतन करते थे,…चादर बाँध कर तुम्हारे गिरते हुये जामुनों को थामने का प्रयास करते थे। तुम्हारे जामुनो मे इतना स्वाद था कि मुझे और कहीं के जामुन कभी पसंद ही नहीं आये।……आगे बढ़ी तो आम का पेड़ लहराकर मेरे आने की प्रसन्नता को प्रकट कर रहा था……एक वात्सल्य भरी दृष्टी उस पर डाली, तभी माँ ने पुकारा कि चलो देर हो रही है।
वापस जाने को मुड़ी तो आम के पेड़ की एक डाली मेरे कुर्ते की बाँह में फंस गयी, मानो कह रही हो कि मत जाओ, मत जाओ मुझे छोड़ कर, मैं वही पेड़ हूं जिसे तुमने बड़े वात्सल्य के साथ एक छोटे से पौधे से इतना बड़ा पेड़ बनाया है, जिसको तुमने सिर्फ़ पानी से ही नहीं अपने प्यार से भी सींचा था और मेरे ऊपर धूल ना जमने पाये इसलिये एक-एक पत्ती को तुम बड़े प्यार से पानी देती थीं, और कहतीं थीं कि तुम मुझे नहला रही हो। मैं वही पेड़ हूं जिसमें पहली बार बौर आये तो तुम ऐसे प्रसन्न हुयीं जैसे माँ अपने पहले शिशु को देख कर प्रसन्न होती है। जब पहला फल आया तो तुमने उसे कितने प्यार से स्पर्श किया था, वो स्पर्श मैं आज भी अनुभव करता हूँ।…क्या तुम्हे स्मरण है जब तुम्हारी सबसे प्यारी सखी ने मेरा कच्चा फल तोड़ लिया था तो तुमने उसे कितना क्रोध किया था, मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी बड़ी बहन मेरी सुरक्षा के लिये खड़ी है। तुम जब मेरे फल तोड़तीं थीं तो इतने प्यार से कि मुझे कभी भी पीड़ा का अनुभव नहीं हुआ……स्मरण है तुम्हारे विवाह के समय तुमने मेरी सुरक्षा के लिये मुझे चारों ओर से चादर से ढाँक दिया था कि कोई भी मुझे चोट ना पँहुचा पाये……तुम्हारी विदाई के समय तुमने मुझे ऐसे देखा था जैसे एक बहन अपने भाई को विदा होते समय देखती है,…और विश्वास करो मैने भी तुम्हे वैसे ही आशीर्वाद दिया था जैसे एक भाई अपनी बहन को देता है……मुझे मालूम है तुम्हे सदा के लिये मुझे छोड़ कर जाना होगा……मुझे ये भी पता है कि अगर तुम्हारे वश में होता तो तुम मुझे भी अपने साथ अपने नये घर में ले जाती, किन्तु ये संभव नहीं है……परंतु ये तो संभव है कि जाते जाते तुम और मैं दो क्षण के लिये वही पुराना समय साथ में स्मरण करें,……फिर तुम मेरी और मैं तुम्हारी स्मृतियाँ लेकर एक दूसरे से विदा ले लेंगे।……आह! मेरे इस पेड़ की पीड़ा को अपने मन में अनुभव करते हुये मैं नम आँखों के साथ पलट गयी,…मुड़ के देखने का साहस नहीं था।……
वापस लौटते समय एक अंतिम बार पलट कर अपने इस प्यारे घर को देखा अबकी बार मन में वो व्याकुलता नहीं थी…हाँ मन में पीड़ा अवश्य थी बिछड़ने की, किन्तु एक संतुष्टी भी थी कि बिना मिले नहीं लौट रही हूं। घर को देखते समय ये अनुभव हो रहा था कि घर मात्र ईंट पत्थर से नहीं बने होते हैं…ये बने होते हैं हमारी भावनाओं से…हमारी अनूभूतियों से…हमारे प्रेम से…हमारी ईच्छाओं से……ये भी हमें उतना ही अनुभव करते हैं जितना हम इन्हें…ये भी उतने पीड़ित होते हैं जितने हम्…इनमें भी वही प्राण बसते हैं जो हममें हैं………इतिश्री

6 comments:

  1. Your rendition really touched the heart because one could feel it coming straight from the heart. You should write more often,your flow of thoughts and writing style is almost like a pro and command over the language excellent !! Good read I give it **** star rating.:-)

    ReplyDelete
  2. thank you Divya for inspirational words. Sure I'll try to write more

    ReplyDelete
  3. आज काफी दिनों के बाद कुछ पढ़ के मेरी आंखें नम हुई। नतमस्तक होता हूं आपकी लेखनी के आगे। ऐसी लेखनी नमन और वंदन दोनों अधिकार रखती है। खुदा आपकी कलम और विचारों को सलामत रखे। जीती रहिये। इतने बढ़िया और टू द पॉइंट लेख के लिए पुनः धन्यवाद

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद, इस उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये…मैं प्रयास करूँगी कि और कुछ अच्छा लिख कर आपका धन्यवाद कर सकूँ…

      Delete

मेरी उत्तराखंड यात्रा (भाग 1)

उत्तराखंड की एक आकर्षक यात्रा में सभी पाठकों का स्वागत है, उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। मेरे साथ जुड़ें क्योंकि हम एक उल्लेखनीय यात्रा ...