Monday, September 28, 2009

समझदार मेंढकी



नमस्ते,
अभी तक मैंने कुछ अच्छा नहीं लिखा है । लेकिन अब मैं गंभीरता से कुछ लिखूंगी। जैसा कि मैंने अपने पहले ब्लॉग में लिखा था, मुझे फिल्मों का बहुत शौक है और मुझे कहानियाँ लिखने का भी शौक है। मैं आशा करती हूँ कि ये कहानियाँ मेरे पढने वालों को पसंद आएँगी। मैंने अपने ब्लॉग के लिए हिन्दी भाषा को इसलिए चुना कि मैं अपनी बात को अधिक स्पष्ट रूप से कह सकू । आज जो कहानी मैं लिख रही हू वो मेरी लिखी हुई नहीं है, दादी कि कहानियो में से है । ये कहानी एक मेंढकी की है :-

बहुत पुरानी बात है , एक मेंढकी थी वह जंगल के पास में घूम रही थी , उसने एक बुढ़िया को देखा वह बुढ़िया परेशान लग रही थी ,मेंढकी ने पूछा क्या बात है आप क्यों परेशान हैं ? उस बुढ़िया ने कहा कि मैं गक्कड़ (एक मोटी गोल रोटी जिसे बाटी भी कहा जाता है )बनाना चाहती हू परन्तु मुझे लकडियाँ नहीं मिल रहीं हैं ,मेंढकी ने कहा मैं लाकर देती हूँ ,मेंढकी ने उसे कुछ लकडियाँ लाकर दी, फ़िर बुढ़िया ने लकडियाँ जलाकर गक्कड़ बनाई ,तब मेंढकी बुढ़िया की गक्कड़ पर कूदने लगी कभी एक गक्कड़ पर कूदती कभी दूसरी पर कभी तीसरी पर इस तरह मेंढकी साड़ी गक्कड़ पर कूद रही थी , बुढ़िया ने पूछा तुम मेरी गक्कड़ पर क्यों कूद रही हो ,मेंढकी ने बोला मैं जंगल से तुम्हारे लिए लकडियाँ लाई तुम मुझे एक गक्कड़ नहीं दे सकतीं ?तो बुढ़िया ने उसे एक गक्कड़ दी।
मेंढकी गक्कड़ को लेकर आगे बढ़ी तो उसे एक कुम्हार (वह जो मिटटी के बर्तन बनाता है ) मिला उसका बच्चा रो रहा था मेंढकी ने पूछा ,क्या हुआ तुम्हारा बच्चा क्यों रो रहा है? तो कुम्हार ने बोला -कि मेरे बच्चे को गक्कड़ खानी है पर मैं अभी काम कर रहा हूँ ,काम ख़त्म करके बना दूँगा ,तो मेंढकी ने बोला ये लो मेरी गक्कड़ उसे खाने को दे दो कुम्हार ने मेंढकी को धन्यवाद दिया और गक्कड़ अपने बच्चे को दे दी ,फ़िर मेंढकी कुम्हार के एक मटकों पर कूदने लगी , कुम्हार ने बोला मेंढकी तुम मेरे मटकों पर क्यों कूद रही हो तो मेंढकी बोली "मैं जंगल गयी वहां से लकड़ी लाई, लकड़ी बुढ़िया को दी, बुढ़िया ने मुझे गक्कड़ दी ,गक्कड़ मैंने तुम्हारे बच्चे को दी, क्या तुम मुझे एक मटका नहीं दे सकते ?" तो कुम्हार ने उसे एक मटका दे दिया ।
मटका ले कर मेंढकी आगे बढ़ी आगे उसे एक दूध वाला मिला वह खल बट्टे में दूध निकल रहा था। मेंढकी ने पूछा कि तुम खल बट्टे में दूध क्यों निकाल रहे हो तो दूध वाला बोला- मेरा मटका आज सुबह ही टूट गया
अब मैं बाज़ार में जाकर दूध बेचूंगा तब नया मटका लूँगा ,तो मेंढकी ने बोला ये लो मेरा मटका ले लो दूध वाले ने मेंढकी को धन्यवाद बोला और मटका लेकर उसमें दूध निकलने लगा तो मेंढकी दूधवाले कि गायों पर कूदने लगी तो दूधवाले ने पूछा" मेंढकी तुम मेरी गायों पर क्यों कूद रही हो ?" तो मेंढकी बोली "मैं जंगल गयी, ,वहां से लकडियाँ लाई लकडियाँ मैंने बुढ़िया को दी,बुढ़िया ने मुझे गक्कड़ दी गक्कड़ मैंने कुम्हार को दी, कुम्हार ने मुझे मटका दिया, मटका मैंने तुम्हे दिया, क्या तुम मुझे एक गाय नहीं दे सकते "? तो दूधवाले ने मेंढकी को एक गाय दे दी गाय लेकर वह आगे चली।
आगे उसे एक राजा मिला जो सूखी रोटी खा रहा था , मेंढकी ने पूछा ""राजाजी आप सूखी रोटी क्यों खा रहे है ?" तो राजा ने उत्तर दिया -कि युद्ध में मैं हार गया मेरा सब राज पाट चला गया अब मेरे पास कुछ नहीं है इसलिए सूखी रोटी खा रहा हूँ , तो मेंढकी ने कहा "लीजिये ये गाय लीजिये और इसके दूध के साथ रोटी खाइए", राजा ने मेंढकी को धन्यवाद बोला और गाय के दूध के साथ रोटी खाने लगा । फ़िर मेंढकी राजा कि तीन रानीयों पर कूदने लगी ,राजा ने पूछा तुम मेरी रानीयों पर क्यों कूद रही हो ? तो मेंढकी बोली "मैं जंगल गयी, वहां से लकडियाँ लाई, लकडियाँ मैंने बुढ़िया को दी, बुढ़िया ने मुझे गक्कड़ दी, गक्कड़ मैंने कुम्हार को दी, कुम्हार ने मुझे मटका दिया, मटका मैंने दूधवाले को दिया, दूधवाले ने मुझे गाय दी ,गाय मैने तुम्हे दी, क्या तुम मुझे एक रानी नहीं दे सकते ?" तो राजा ने मेंढकी को एक रानी दे दी ।
रानी को लेकर मेंढकी आगे बढ़ी आगे उसे एक ढोल बनाने वाला मिला वह खाना बना रहा था , मेंढकी ने उससे पूछा तुम ख़ुद खाना क्यों बना रहे हो ? तो ढोलवाला बोला- मेरी शादी नहीं हुई है इसलिए मैं ख़ुद खाना बनाता हूँ ,तो मेंढकी बोली ये लो ये रानी ले लो ये तुम्हारे लिए खाना बनाएगी ढोलवाले ने मेंढकी को धन्यवाद कहा और रानी ले ली ,फ़िर मेंढकी ढोलवाले के ढोलों पर कूदने लगी ढोलवाले ने पूछा मेंढकी तुम मेरे ढोलों पर क्यों कूद रही हो ? तो मेंढकी बोली " मैं जंगल गयी, वहां से लकडियाँ लाई, लकडियाँ मैंने बुढ़िया को दी, बुढ़िया ने मुझे गक्कड़ दी, गक्कड़ मैंने कुम्हार को दी, कुम्हार ने मुझे मटका दिया, मटका मैंने दूधवाले को दिया, दूधवाले ने मुझे गाय दी ,गाय मैंने राजा को दी, राजा ने मुझे रानी दी रानी दी, रानी मैने तुमको दी, क्या तुम मुझे एक ढोल नहीं दे सकते ?" तो ढोलवाले ने मेंढकी को ढोल दे दिया ।
ढोल लेकर मेंढकी आगे बढ़ी और एक पेड़ पर बैठ गयी ,थोडी देर बाद उस पेड़ के नीचे दो चोर आए और अपने चोरी के माल का बंटवारा करने लगे तो मेंढकी ने पेड़ पर से ही ढोल बजाना चालू किया, जिससे चोर डर गए क्योंकि उन्हें ढोल तो दिखा पर मेंढकी नहीं दिखी ,चोरों ने सोचा भूत है और वे डर के मारे चोरी का माल वहीँ छोड़ के भाग गए ,फ़िर मेंढकी नींचे उतरी और ढोल को एक तरफ़ से फाड़ कर उसमे चोरों का छोड़ा हुआ माल भरा और चली गयी और सारा जीवन आराम से बिताने लगी ।

तो ये थी हमारी दादी ,नानी कि कहानी । आप को कैसी लगी बताइए ।

धन्यवाद ।

मेरी उत्तराखंड यात्रा (भाग 1)

उत्तराखंड की एक आकर्षक यात्रा में सभी पाठकों का स्वागत है, उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। मेरे साथ जुड़ें क्योंकि हम एक उल्लेखनीय यात्रा ...