Monday, April 14, 2014

चुनावी माहौल और नेताओं की वाणी

         अपने मध्यकाल की ओर बढ़ रहा वर्ष 2014 अन्य बातों के अलावा राजनीति के भयावह वैचारिक प्रदूषण, ईर्ष्या, नफरत और जहरीले बयानों के लिए भी याद किया जाएगा. बेशक यह समयकाल सोलहवीं लोकसभा के गठन के लिए हो रहे संघर्षों, ज्यादातर राजनीतिक दलों के वैचारिक दीवालियेपन की भी याद दिलाएगा, साथ ही यह भी कि कैसे भारत का मतदाता (चाहे वह युवा, प्रबुद्ध वर्ग से हो या फिर मजदूर, किसान, व्यापारी, नौकरीपेशा या उद्यमी) एक चाय बेचने वाले ‘स्वप्नद्रष्टा’ के पीछे आ खडा हुआ. इस महासंग्राम के नतीजे जो भी हों (क्योंकि ये पंक्तियाँ चुनाव नतीजे आने से पहले लिखी गयी हैं) मगर एक बात बहुत साफ़ है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. आगे भी होगा, इसकी गारंटी नहीं. इस आधुनिक काल में तकनीकी संसाधनों का इतना सुनियोजित इस्तेमाल पहली बार देखने को मिला. शायद यही वजह रही कि हम आसानी से यह भी जान सके कि देश के विकास के लिए किसकी क्या रणनीति है, कौन सा नेता किसको कितने भद्दे तरीके से गरिया रहा है, किसके मन में कितना जहर भरा है और कौन कितना गिर चुका है. एक तरफ गुजरात की अनुकरणीय कामयाबी के आत्मविश्वास से लैस नरेंद्र मोदी देश को सुखद भविष्य के सपने दिखाते मिले तो दूसरी तरफ वे ताकतें उन्हें पानी पी पीकर गाली देती रहीं जिन्हें इस देश समाज की तनिक भी फ़िक्र नहीं, केवल सत्ता प्राप्ति से मतलब है. ऐसे नेताओं के लिए उनका कुनबा ही देश और समाज है. उसी के भले के लिए वे मरे जा रहे हैं.
          जरा नमूने देखें. शुरुआत होती है कुछ माह या साल पहले जब देश की सबसे पुरानी पार्टी (माफ़ कीजिये, उसे अब पार्टी कहने में भी शर्म आती है क्योंकि वह भी अब घोर परिवारवाद की गिरफ्त में है) ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा, वह भी एक नहीं बार बार. और जब मोदी ने परिवारवाद के मोह से ग्रसित महारानी के पुत्र को शहजादा कहा तो मानो भूचाल आ गया. मोदी पर हमले और तेज हो गए, लेकिन यह बात ज्यादातर लोग समझ रहे थे कि आखिर मोदी उसे और क्या कहते भला. खैर, यह तो कुछ ख़ास नहीं. चुनावी पारा चढ़ा और जिन्हें अपनी हार साफ़ दिखने लगी वे तो बौरा ही गए. एक पार्टी है (उसे कुनबा कहें तो ज्यादा सही रहेगा) समाजवादी पार्टी. समाजवाद से दूर दूर तक कोई मतलब नहीं. खुद साम्प्रदायिकता और जातिवाद के सहारे सत्ता में बैठे इन लोगों को मोदी का विकासवाद रत्तीभर नहीं भाया. वे लगे जहर उगलने. आजम खान जैसा आदमी मोदी को कुत्ते के पिल्ले का बच्चा कह बैठा और विडम्बना देखें कि उसे अपनी कथनी पर जरा भी शर्म नहीं. 
             इसी पार्टी के मुखिया मौलाना मुलायम तो चार कदम और आगे निकल गए. ऐसे-ऐसे बयान दे रहे हैं कि छंटा हुआ बदमाश भी शरमा जाये। अभी हाल ही में नेताजी अर्थात सपा के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार के बारे में बयान दिया. कह बैठे कि लड़के तो लड़के हैं, गलतियाँ हो जातीं हैं, तो क्या उन्हें फांसी पर चढ़ा देंगे. उन्हें फ़ांसी की सज़ा देना गलत है. सच तो यह है कि इस तरह का बयान देकर ‘नेता जी’ ने निकृष्टता की सारी सीमाएं पार कर दीं. गरज सिर्फ इतनी थी कि चुनाव का माहौल उनके पक्ष में हो जाए. हालांकि जब पासा उल्टा पड़ता दिखा तो लगे सफाई देने और कहने लगे, मैंने ऐसा थोड़े ही कहा था. हद तो तब हो गयी जब नेताजी की ही पार्टी का महाराष्ट्र प्रतिनिधि अबू आजमी एक कदम और बढ़ गए और महिलाओं के खिलाफ विष वमन किया. गनीमत यह रही कि अबू के बेटे और बहू ने उनके बेहूदा बयान से द्दोरी बनाने में ही भलाई समझी. समाज के जिस घिनौने अपराध के खिलाफ सारा देश एकजुट है, जिस जघन्य अपराध को रोकने के लिए दिल्ली मे इतना बड़ा आंदोलन चला, उसे कितनी सरलता से नेताजी ने झुठला दिया। क्या यही सम्मान है नारी का इन नेताओं के मन में? ऐसा कोई वाकया नेताजी के घर की किसी महिला के साथ हुआ होता तो भी नेताजी उसे गलती घोषित करते? सवाल यह भी है कि यह सब बकवास करके नेताजी किनका वोट प्राप्त करना चाह रहे हैं? बलात्कारियों का? इसमें शक नहीं कि ऐसे ही कुत्सित और निर्लज्ज विचारधारा वाले लोगों के कारण बलात्कार की घटनाएँ बढ़ी हैं. कोई भी यह जानकार स्तब्ध रह जाएगा कि महिलाओं के लिए दुनिया के सबसे असुरक्षित देशों में भारत चौथे नम्बर पर है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में औसतन हर दो घंटे में बलात्कार की दो घटनाएं होती हैं. देश में सालाना 25 हजार से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं. औसतन रोजाना बलात्कार के 50 मामले दर्ज हो रहे हैं. 20 वर्षों में दोगुनी हो गयी हैं बलात्कार की घटनाएं. बलात्कार के 44.5 प्रतिशत मामले अकेले यूपी, एमपी और महाराष्ट्र में सामने आए. यह तब है जबकि एक आकलन के अनुसार देश में महिला उत्पीडन के 90 प्रतिशत मामले दर्ज ही नहीं होते. अब कोई नेताजी से पूछे, भईया क्या हो रहा है यह सब. मुझे तो लगता है, इन विकृत, दुर्बुद्धि वाले नेताओं को ही पहले सजा देनी चाहिये। नेताओं को भी सबक मिलेगा और बलात्कारियों को भी।
खैर...आइए आजम खान के एक और बयान पर गौर करें. हाल ही में उन्होंने फरमाया कि करगिल की लड़ाई मुसलमान सैनिकों के कारण जीती गयी है हिन्दू सैनिकों के कारण नहीं। मैंने जब ये सुना तो पहले कानों पर विश्वास नहीं हुआ. लगा अप्रैल फ़ूल अभी भी बनाया जा रहा है, आखिर अप्रैल अभी खत्म तो हुआ नहीं है। लेकिन जब कई समाचार पत्रों मे पढ़ा तब जाकर विश्वास हुआ, मन किया कि सर पीट लूँ अपना. अरे भाई अब मात्र सैनिक ही तो बचे हैं हमारे देश मे जो अपना काम बिना लालच के, बिना जात-पात के भेदभाव के बड़ी मेहनत और ईमानदारी से कर रहे हैं। आपने इन्हें भी हिन्दू मुसलमान के तराज़ू में तोल दिया। अच्छा हुआ नेताओं के परिवार वाले सेना में नहीं हैं, वरना ये लोग वहाँ भी जात-पात का खेल चालू कर देते।
खैर ये हुआ एक बयान, इससे पहले काँग्रेस के एक नेता ने बयानबाज़ी की कि वो मोदी के टुकड़े-टुकड़े कर देगा। तो भाई कोई इनसे ये पूछे कि ये चुनाव लड़ रहे हैं या दंगा कर रहे हैं या फ़िर फ़िल्मी लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें नायक या खलनायक बड़बोलापन करता है कि मैं तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। हद हो गयी। खैर इस बयान के लिये महाशय ने जेल की हवा खा ली ये अच्छा रहा। कांग्रेस के ही एक नेता बेनी प्रसाद वर्मा भी बौराए हुए हैं. कभी मोदी को डैंजरस डॉग कह देंगे तो कभी डैंजरस कैट. क्या तमाशा है भाई. हद तो यह है कि चुनाव आयोग ने अभी उन पर लगाम नहीं लगाई है,
मैं पूछना चाहती हूँ सभी नेताओं से कि क्या आपने चुनाव आचार संहिता नाम की किसी वस्तु का नाम कभी सुना है, अगर सुना है तो क्या कभी उसको पढ़ा भी है। जिस तरह की भाषा आप लोग जनता के सामने उपयोग कर रहे हैं ऐसी भाषा क्या आप आपके अपनों के सामने भी प्रयोग मे लाते हैं. अगर नहीं तो जनता के सामने क्यों ऐसी भाषा बोल रहे हैं? इसका अर्थ ये है कि जो जनता आपको वोट दे रही है आप उसे अपना नहीं समझते हैं, तो फ़िर ये जनता आपको वोट क्यों दे? और भैया अगर आप आपके अपनों के सामने भी ऐसी ही भाषा प्रयोग करते हैं तब तो ये प्रार्थना है कि आप जैसे नगीनों से भगवान हमारे देश को बचाये रखे।
तो हे आदरणीय नेतागणों! कृपा करो इस देश, देश की जनता, देश की सभ्यता पर, और जोश में कुछ भी बोलने से पहले होश करके सोच लिजिये कि कहीं आपके बयानों की वजह से आप चुनाव जीतने के बजाय अपनी मिट्टी ही पलीद न करा लें. क्योंकि ये पब्लिक है पब्लिक बाबू, ये सब जानती है और समझती है। इसलिये आपकी भी समझदार बनने में ही भलाई है, समझे!


(मैं सादर आभार प्रकट करती हूँ वरिष्ठ पत्रकार श्री राम अनूप द्विवेदी जी का कि उन्होंने मेरे लेख का संपादन करके उसमे आवश्यक बातें जोड़ के उसे सुन्दर बना दिया)

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