मित्रों आज मैं आपको दासी से रानी, रानी से राजमाता और पुनः दासी बनी स्त्री की कहानी बताने जा रही हूँ। और हां!!! ये कहानी मेरी कल्पना मात्र है, अगर किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या घटना से इसकी समानता होती है तो वह संयोग मात्र होगा, मुझ पर धारा 66 A मत लगा देना।
तो कहानी ये है कि अडोस-पड़ोस में दो राज्य थे मंडली और महारत, दोनों राज्यों में बनती नहीं थी। मंडली के राजा ने महारत देश को लूटने के लिए एक योजना बनायी। मंडली के राजा की योजना के अनुसार मंडली राज्य की एक दासी ने महारत राज्य के सुन्दर किन्तु मूर्ख राजकुमार से विवाह किया और महारत राज्य में आ कर मज़े करने लगी। तभी एक दुर्घटना में राजकुमार के माता-पिता की मृत्यु हो गयी, वह राजकुमार राजा बन गया और दासी रानी बनकर मज़े करने लगी। किन्तु दुर्भाग्यवश राजा बने राजकुमार की भी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। अब राज्य की बागडोर दासी से रानी बनी स्त्री के हाथ में आ गयी।
रानी के चापलूस और भांड लोग बड़े जोर-शोर से नयी रानी की ताजपोशी की तैय्यारी करने लगे। लेकिन कुछ लोग ये नहीं चाहते थे की हमारे राज्य की बागडोर पड़ोसी राज्य से आया व्यक्ति संभाले तो वे सब इस ताजपोशी का विरोध करने लगे। अब रानी परेशान हो गयी क्योंकि उसका पुत्र तो महामूर्ख था वह राजा बनने योग्य नहीं था, अब रानी क्या करे??
तब रानी को एक तरकीब सूझी उसने एक मोम का पुतला बनाया जो दिखने में तो एकदम मनुष्य जैसा था लेकिन उसमें जान नहीं थी और उसे राजा बना दिया और स्वयं राजमाता बन बैठी। वह मोम का पुतला केवल राजमाता की ही बात सुनता था, जो भी राजमाता कहती उसका जवाब वह "जी राजमाता " कह कर देता था और अगर उससे कोई कुछ पूछता तो वह राजमाता के इशारे पर ही जवाब देता। महारत की मूर्ख जनता राजमाता की इस चाल को समझ नहीं पाई, क्योकि महारत एक विद्वान के अनुसार महारत की आधी से अधिक जनता मूर्ख थी। बचे-खुचे समझदार लोग इस चाल को समझ तो गए थे लेकिन कुछ कर पाने में असमर्थ थे।
राजमाता ने कुटिल योजना के आधार पर अपने मंत्रीमंडल में सारे चापलूस और लालची लोग भर लिए जो धन के लिए राजमाता का गुणगान करते थे और राजमाता के काले कारनामों की अनदेखी करते थे। राजमाता की तरफ से इन मंत्रियों को लूट मचाने की पूरी छूट थी। अब राजमाता अपने पुतले की सहायता से धीरे-धीरे महारत का सारा धन के मंडली राज्य में पहुँचाने लगी और भ्रष्ट मंत्री लोग भी महारत के धन को हलवा-पूरी की तरह से डकारने लगे।
धीरे-धीरे महारत की जनता कंगाल होने लगी यहाँ तक कि लोगों के भूखों मरने की नौबत आ गयी। लोगों को खाने को तो दूर पीने का पानी भी नसीब नहीं हो रहा था। खेत सूख गए थे, मवेशी भी प्यास से मरने लगे थे क्योकि मंत्री लोग सिंचाई के लिए दिया जाने वाला धन भी हज़म कर गए थे। जनता में हाहाकार मच गया, लोग त्राहि-त्राहि करने लगे।
तब जनता ये करुण रुदन शेष-शैय्या पर लेटे श्री हरी के कानों में पहुँचा, इतनी करुण पुकार थी की सुन कर नारायण उठ खड़े हुए, नीचे झाँका तो लोगों की हालत देख कर व्याकुल हो उठे। नारायण से लोगों की यह दशा देखी नहीं गयी। उन्होंने महारत की "जनता की दशा" बदलने के लिए तुरंत "राजमाता की दिशा" बदलने का निर्णय लिया और यमराज की अनुपस्तिथि में स्वयं ही चित्रगुप्त को एक यमदूत भेज कर राजमाता के प्राण हर लाने का आदेश दे दिया।
आदेशानुसार यमदूत गया और राजमाता के प्राण हर लाया। तभी यमराज भी कहीं से वापस आ गए, उन्होंने देखा यमदूत किसी के प्राणों को हर कर नर्क की तरफ ले जा रहा है, उन्होंने तुरंत यमदूत को रोका और पूछा--"कौन है ये"??? यमदूत बोला--"ये महारत की राजमाता हैं, इसने महारत की जनता का जीना दूभर कर दिया था तो श्री हरी ने आपकी अनुपस्तिथी में इसके प्राण हर लाने का आदेश दिया था"। यमराज ने दूसरा प्रश्न किया--"इसे नर्क की ओर क्यों ले जा रहे हो"???? यमदूत आश्चर्य से यमराज की ओर देखकर बोला---"हे स्वामी!! आपको बताया न कि इसके कारण जनता कितनी दुखी है, अब ऐसे पापी को तो नर्क में ही जाना होगा ना"
यमराज क्रोध से गरज कर बोले--"नहीं!!! वैसे ही पापी मंत्रियों के कारण नर्क में क्षमता से अधिक लोग हो गए हैं उस पर ये तो पापियों की माँ है, इसने तो इतने पाप किये हैं कि इसे नर्क में भी स्थान नहीं मिलेगा, मैं इसे नर्क में प्रवेश की अनुमति नहीं दूँगा"। यमदूत बोला-- "महाराज तो मैं अब क्या करूँ"??? यमराज बोले---"मुझे नहीं पता जाओ श्री हरी से ही पूछो"।
यमदूत भागा-भागा नारायण के पास पहुंचा और सारा हाल श्री हरी को कह सुनाया, तब श्री हरी ने यमराज को बुलवाया, यमराज ने नारायण को भी यह कह कर मना कर दिया कि राजमाता के पाप नर्क की क्षमता से अधिक हैं इसलिए मैं इसे नर्क में स्थान नहीं दे सकता। नारायण भी विचार में पड़ गए कि क्या किया जाय, स्वर्ग में तो इसका प्रवेश असंभव है, नर्क में भी संभावना नहीं दिख रही है। बहुत विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय हुआ कि इसके प्राणों को वापस इसके शरीर में डाल दिया जाय और मृत्यु-लोक में ही इसके दंड की व्यवस्था की जाए। तभी यमदूत बोला--"हे नारायण लेकिन इसके शरीर को तो जलाया जा चुका है"। अब तो और समस्या उत्पन्न हो गयी, इस उलझन की स्थिति से निपटने के लिए समस्त देवताओं की बैठक बुलाई गयी।
सभी देवतागण असमंजस में थे कि क्या किया जाय, सभी कह रहे थे--"कि जीते-जी इसने मनुष्य लोक को परेशान किया अब मरने के बाद देव लोक को परेशान कर रही है," इसे अत्यंत कठोर दंड तो मिलना चाहिए, किन्तु क्या दंड ??? सब सोच में थे तभी महर्षि नारद ने एक सुझाव दिया--हे नारायण ये पापी स्त्री ना तो भू-लोक के योग्य है ना ही देव लोक के, क्या आप सब त्रिशंकु को भूल गए??? इसे भी उसी की तरह से दोनों लोकों के बीच में लटका देते हैं।"
इधर महारत देश में अचानक राजमाता की मृत्यु से महारत का मंत्रीमंडल तितर-बितर हो गया, लोग दौड़े-दौड़े मोम के पुतले के पास गए, लेकिन उन मूर्ख लोगों को तो ये पता ही नहीं था कि वह तो पुतला मात्र है, बिना राजमाता की आज्ञा के तो वह हिल भी नहीं सकता, अब क्या करें सारे मंत्री आपस में लड़ने लगे। बौखला कर एक-दुसरे की ही पोल खोलने लगे। और लूट-मार मचाने लगे। लोग और परेशान हो गए।
तब बची-खुची समझदार जनता अवसर की माँग को देखते हुए "नमो-नमो हे! नारायण" करते हुए अपना एक सशक्त और ईमानदार नेता चुन कर उसके हाथ महारत की बागडोर सौंप दी। जनता के इस नए प्रतिनिधी ने पूरे भ्रष्ट मंत्रीमंडल को बर्खास्त कर दिया और नए ईमानदार मंत्रियों के साथ कार्य करने लगा। धीरे-धीरे उसने महारत की दशा भी सुधार दी और दिशा भी प्रगती की ओर कर दी। और अब महारत के लोग सुख तथा शांति से अपना जीवन व्यतीत करने लगे। ईति श्री ......
अरेरेरेरे!!!! हाँ राजमाता की दशा तो मैं बताना ही भूल गयी, नारद मुनि का प्रस्ताव सर्वसम्मति से ख़ारिज हो गया और राजमाता को कठोर दंड देने के लिए उसकी आत्मा को महारत राज्य के ही एक मंत्री के घर की मरी हुई दासी के शरीर में डाल दिया गया। अब उस मंत्री की खडूस पत्नी उससे खूब जी तोड़ काम करवाती है और इस तरह से वह राजमाता से पुनः बनी दासी अपने पापों का पर्याप्त दंड भुगत रही है। अब इति श्री ......