Wednesday, June 14, 2023

मेरी उत्तराखंड यात्रा (भाग 1)

उत्तराखंड की एक आकर्षक यात्रा में सभी पाठकों का स्वागत है, उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। मेरे साथ जुड़ें क्योंकि हम एक उल्लेखनीय यात्रा करने वाले हैं। यह यात्रा लुभावने परिदृश्यों, मनोरम किंवदंतियों और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण यात्रा  होगी।

दिन 1: दिल्ली से ऋषिकेश।

6 मई 2023 को हमारा सफ़र शुरू होता है दिल्ली से। दिल्ली में हमने एक टैक्सी करी जो हमें पूरा उत्तराखण्ड घुमा कर वापस दिल्ली पहुंचा देगी। दिल्ली से हमने शानदार मथुरा एक्सप्रेसवे से गुजरते हुए अपनी यात्रा शुरू की। इस रास्ते में अनेक शानदार ढाबे मिलते हैं, इन्हीं मे से एक ढाबे में हमने दोपहर का भोजन किया और आगे बढ़ चले। हमने अपना पहला रात्रि विश्राम ऋषिकेश में किया। ऋषिकेश में हमने गढ़वाल मण्डल विकास निगम के होटल मे एक रूम लिया।

दिन 2: ऋषिकेश से त्रियुगीनारायण 

दूसरे दिन अर्थात 7 मई 2023 को हम सुबह-सुबह 5:30 बजे ही अपने आगे के सफर पर निकल गए। अब हमारी उत्तराखंड की रोमांचक यात्रा ऋषिकेश से शुरू होती है, जिसे "योग नगरी" भी कहा जाता है। ऋषिकेश को पीछे छोड़ते हुए हम आगे की ओर बढ़ते हैं। क्योंकि हम ऋषिकेश से सुबह जल्दी ही निकाल गए थे तो हमने नाश्ता नहीं किया था। इस कारण हमने थोड़ा आगे जाकर ब्यासी में चाय पी और स्वादिष्ट, गर्मागरम आलू के पराठों का आनंद लिया। नाश्ता करके थोड़ी ऊर्जा लेकर अब हम निकाल पड़े अपनी आगे की यात्रा पर। गंगा नदी के प्रवाह के साथ-साथ गुजरते हुए हम देवप्रयाग पहुँच गए। देवप्रयाग में अलखनंदा और भागीरथी नदियों का संगम होता है। यहीं से दोनों नदियाँ मिलकर पवित्र गंगा नदी का निर्माण करतीं हैं जो ऋषिकेश की तरफ़ जाती है। इस विहंगम संगम को देखकर सभी यात्री और श्रद्धालु आत्मविभोर हो जाते हैं। अलखनंदा और भागीरथी का यह पवित्र संगम अद्भुत और अतिसुंदर है। 

                                               देवप्राग, अलकनंदा और भागीरथी का संगम

हम अपनी यात्रा जारी रखते हैं और इन सांप के जैसी टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों से आगे बढ़ते हुए, श्रीनगर से गुज़रते हुए (जी हाँ उत्तराखंड में भी एक श्रीनगर है) रुद्रप्रयाग (जहाँ कि अलखनंदा और मंदाकिनी नदियों का संगम है) होते हुए अगस्त्यमुनि पहुँचे। अगस्त्यमुनि से थोड़ा आगे जाकर हमने एक और ब्रेक लिया और पेट पूजा की।

अगस्त्यमुनि के पास सोढ़ी गाँव में नदी के बीच में एक विशाल शिला दिखायी देती है जिसे सतडूँगू कहा जाता है। जब पाँडव स्वर्गारोहण के लिए हिमालय जा रहे थे तो वे यहाँ से गुज़रे थे। आगे बढ़ते समय उनका सत्तू (भूने हुए जौ, मक्का या/और चने का आटा) का थैला यहीं छूट गया। यह सतडूँगू शिला उनका वही सत्तू है। 2013 में जब केदारनाथ का बाढ़ का पानी यहाँ आया तो उसने बड़े-बड़े पत्थरों को बहा दिया लेकिन यह शिला जरा भी नहीं हिली और वैसी की वैसी ही खड़ी रही। आप सब हैरान हो गये होंगे ना, उत्तराखंड को देवभूमि ऐसे ही थोड़ी कहा जाता है। यहाँ पग-पग पर आपको देवताओं विराजमान होने के प्रमाण मिलेंगे।

                                                  सतडूँगू                                                                                                                                                      

आगे बढ़ते हुए हमने पहाड़ी फल हीसूल का आनंद उठाया। हीसूल पहाड़ी बेरी होती है जो पीले रंग की होती है और बहुत मीठी होती है। अपने हाथ से हीसूल तोड़ कर खाने में बहुत मज़ा आया।                                                             हीसूल

अब यहाँ से आगे बढ़ते हुए गुप्तकाशी, रामपुर, सीतापुर होते हुए हम सोनप्रयाग पहुँचे। सोनप्राग से एक रास्ता केदारनाथ जाता है और एक रास्ता त्रियुगिनारायण की ओर जाता है। सोनप्रयाग में आपको ट्रेफिक जाम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि केदारनाथ यात्रा के लिए गाड़ियों का आखिरी पड़ाव सोनप्रयाग ही है। 

हम गाड़ियों की लंबी कतार को पार करते हुए अपने गंतव्य त्रियुगिनारायण पहुँच गये। हम सुबह जल्दी ही निकाल गये थे तो, त्रियुगिनारायण भी बहुत जल्दी अर्थात दोपहर के 3 बजे ही पहुँच गये। हमने होटल पहले से ही बुक कर लिया था इसलिए हमारा खोजबीन का समय बच गया और हम तुरंत ही मंदिर में दर्शन करने चले गये। मंदिर में पुजारी जी ने हमसे पूरे विधि-विधान से पूजा करवायी।

                                                          त्रियुगिनारायण मंदिर                                                                                                               
त्रियुगिनारायण मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। स्वयं विष्णु भगवान इस विवाह के साक्षी थे। विष्णु भगवान के वामन अवतार का जन्म इसी स्थान पर हुआ था इसलिए त्रियुगिनारायण में विष्णु भगवान के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस कारण से त्रियुगिनारायण का धार्मिक और एतिहासिक महत्व है।                                                                                                                                                                                       जल्दी पहुँचने का ये फायदा हुआ की 4 बजे विधि-विधान से पूजा करने के बाद हमें शाम की आरती में सम्मिलित होने का भी अवसर मिल गया। आरती के बाद हमने अपने होटल में ही पहाड़ी भोजन "चौसा-भात" का आनंद लिया। मौसम ठंडा होने और दिनभर की थकान के कारण हमें जल्दी ही नींद या गई। इस तरह हमारी उत्तराखंड यात्रा का दूसरा दिन समाप्त हुआ।                                                                                                                                आपसे जल्दी ही मिलेंगे मेरी उत्तराखंड यात्रा के दूसरे भाग में 


मेरी उत्तराखंड यात्रा (भाग 1)

उत्तराखंड की एक आकर्षक यात्रा में सभी पाठकों का स्वागत है, उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। मेरे साथ जुड़ें क्योंकि हम एक उल्लेखनीय यात्रा ...