सुबह के 8
बज रह थे मधुरा
अपने रसोई के काम समेट कर निधि
के कमरे में जाती है, निधि
अभी तक सो रही थी।
“निधि
उठो कॉलेज नहीं जाना क्या"?
मधुरा ने निधि
को झकझोरते हुए कहा।
“माँ
अभी 8 ही
तो बजे हैं, कॉलेज
10 बजे
शुरू होते हैं" निधि
ने अलसाते हुए कहा।
“अरे
तो क्या सीधे 10 बजे ही उठेगी? तैयार
नहीं होगी?” चल
अब जल्दी से उठ जा मधुरा ने
गुस्से से बोला।
"आजकल
के बच्चे समय की कीमत समझते ही
नहीं हैं" मधुरा बड़बड़ाते
हुए अपने बेडरूम में गई।
“सुनिये, जल्दी तैयार होकर बाहर आ जाईये
नाश्ता टेबल पर रखा है,
ठंडा हो जाएगा"। मधुरा ने प्रकाश
को बोला।
“आता
हूँ बीवी आता हूँ" कहते
हुए प्रकाश बाहर आकर नाश्ता
करना चालू कर देता है। "वाह
पराँठे तो बड़े मस्त हैं,
निधि नाश्ता
नहीं करेगी क्या?” प्रकाश
ने पूछा।
"तुम्हारी
लाड़ली अभी तक मज़े से सो रही
है, कॉलेज
का समय हो रहा है लेकिन उसे
कोई चिंता ही नहीं है"
मधुरा ने जवाब
दिया।
“अरे
ठीक है यही तो दिन हैं उसके
मज़े करने दो, बाद
में तो उसे भी मेरे और तुम्हारे
तरह काम में व्यस्त हो जाना
है" प्रकाश
ने मुसकुराते हुए कहा।
“तुम
उसे लाड़ में बिगाड़ दोगे"
मधुरा बोल ही
रही थी कि निधि बाहर आते हुए
बोली- "लो
उठ गई, मिल
गई शाँति?”
“हाँ
हाँ ठीक है अब नाश्ता कर ले और
जल्दी से तैयार हो जा"
मधुरा बोली।
“नहीं
माँ आज कॉलेज में हड़ताल है
तो आज हम लोग फिल्म देखने
जायेंगे" निधि
ने जवाब दिया।
अब
मघुरा को गुस्सा आ गया और वो
ज़ोर से बोली "क्या?
फिर से हड़ताल!
ये लोग कॉलेज
पढ़ने के लिये जाते हैं या
लड़ने के लिये, जब
देखो तब हड़ताल।
इस
बार प्रकाश ने जवाब दिया "सही
तो है, अपने
अधिकारों के लिये लड़ना तो
चाहिये ही"
"ठीक
है ठीक है करो अपने मन की"
मधुरा बड़बड़ाते
हुए अपने काम में लग गई,
प्रकाश ऑफिस और निधि तैयार होने चली गई।
इसी
तरह कुछ दिन बीत गए, लेकिन
मधुरा को निधि के व्यवहार में
कुछ अंतर नज़र आ रहा था। एक
रात को उसे प्रकाश बात की "सुुनो, निधि कुछ गुमसुम सी नहीं लग
रही है? पहले
जैसी हंसती खिलखिलाती नहीं
है और अब मुझसे बहस भी नहीं
करती"।
प्रकाश
ने हँसते हुए कहा "कमाल
है जब वो बहस करती थी तब भी तुम
नाराज़ होती थीं और अब वो बहस
नहीं कर रही है तब भी तुमको
बुरा लग रहा है, एसा
कुछ नहीं है पढ़ाई का तनाव है
और कुछ नहीं निश्चि़त होकर
सो जाओ।
परंतु
मधुरा को नींद नहीं आ रही थी।
उसने मन ही मन में सोचा कल निधि
से अवश्य पूछूँगी क्या बात
है।
दूसरे
दिन सुबह प्रकाश के ऑफिस जाने
के बाद मधुरा निधि के पास गई
और उससे पूछा "निधि
बेटा तुम्हारी तबियत ठीक नहीं
है क्या? इतनी
गुमसुम क्यों हो?”
"नहीं
माँ कुछ नहीं सब ठीक है"
निधि ने सकपकाते
हुए कहा।
निधि
बहुत देर तक टालमटोल करती रही,
फिर मधुरा ने
उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते
हुए कहा "निधि
अपनी माँ को नहीं बताओगी क्या
हुआ"।
निधि
अपनी माँ के गले लग कर फफक कर
रो पड़ी और बोली "माँ
हमारे केमेस्ट्री के सर हैं
ना" बोलते
हुए निधि अचानक रूक गई।
"बोल
बेटा क्या किया तेरे केमेस्ट्री
के सर ने”- मधुरा ने पूछा।
"माँ
कल उन्होने मुझे लैब में बुलाया
मेरे डाउट सॉल्व करने के लिये
और मुझे इधर ऊधर हाथ लगाने
लगे, मुझे
बहुत गंदा लगा मैं वहाँ से भाग
गई लेकिन ऊन्होने धमकी दी कि
अगर किसी को बताया तो मुझे फेल
कर देंगे।" कह
कर निधि फूट फूट कर रोने लगी।
मधुरा
गुस्से से काँप रही थी,
उसने रोती हुई
निधि के सर पर प्यार से हाथ
फेरते हुए कहा "ना
मेरी बच्ची तेरी माँ है ना,
तू बिल्कुल
भी मत डरना।
उसी
दिन मधुरा ने ये बात प्रकाश
को बताई, प्रकाश
गुस्से में चिल्ला उठा "मैं
उसकी जान ले लूँगा, उसने
मेरी बेटी को हाथ कैसे लगाया"।
“हाँ
प्रकाश, हम
कल ही कॉलेज जाकर प्रिंसिपल
से शिकायत करेंगे।"- मधुरा ने बोला ।
प्रकाश
शाँत होते हुए बोला "मधुरा
इस बात को और नहीं बढ़ाना
चाहिये, बदनामी
हमारी ही होगी, निधि
को भी बोलो भूल जाए और उस सर
से दूर रहे"
“ये
क्या कह रहे हो प्रकाश?”
मधुरा आँखे
फाड़ कर बोली। "उसने
हमारी बेटी के साथ जो किया वो
भूल जाएँ, उसे
सज़ा नहीं दिलवाएँ, क्या
हुआ तुम्ही ने कहा था ना अधिकारों
के लिये लड़ना सही है?”
"वो
सब दूर से ही सही लगता है,
लेकिन याद रखो
इससे कुछ होने वाला नहीं है
बदनामी हमारी ही होगी,
इसलिये तुम
दोनो जितना जल्दी हो सके इस
बात को भूलने की कोशिश करो.”
प्रकाश गुस्से
से बोला और सो गया। लेकिन मधुरा
की तो नींद उड़ चुकी थी।
दूसरे
दिन सब लोग चुपचाप थे लेकिन
मधुरा मन अशाँत था, प्रकाश
के जाते ही वह निधि को लेकर
प्रिंसिपल के पास पहुँची और
उसे पूरी घटना बता दी। प्रिंसिपल
को बहुत गुस्सा आया वो बोला
"आप
चिंता मत किजिये हम सर को समझा
देंगे लेकिन इसे आप और मत
बढ़ाइये, कॉलेज
की बदनामी हो जायेगी।"
मधुरा
समझ गई कि प्रिंसिपल कुछ नहीं
करेगा। वो चुपचाप घर चली आई।
प्रकाश बोला "देखा
मैने कहा था न कुछ नहीं होगा"।
लेकिन
मधुरा हार नहीं मानने वाली
थी आकिर वो एक माँ थी और बेटी
का दर्द माँ ही समझ सकती है।
धीरे
धीरे पता चला कि निधि अकेली
नहीं थी कई और लड़कियों के साथ
उस सर ने दुर्व्यवहार किया था
लेकिन बदनामी के डर से सब चुप
रहे।
मधुरा
ने सोच लिया कि उसे क्या करना
है। मधुरा ने पहले एक व्हाट्एप
ग्रुप बनाया और धीरे धीरे निधि
की सारी सहेलियों और फिर कॉलेज
के कई विद्यार्थियों के
माता-पिता
को ग्रुप में जोड़ लिया,
फिर सबको धीरे
धीरे समझाना शूरू किया किया
कि निधि के साथ जो हुआ है वो
कई लोगों के साथ हुआ है और अगर
इस सर को सज़ा न दिलवाई तो औरों
के साथ भी ये हो सकता है।
देर
से ही सही पर धीरे धीरे करके
सारे अभिभावक मान गए। फिर एक
दिन सब लोग मिल कर प्रिंसिपल
के पास पहुँचे और प्रिंसिपल
से कहा कि अगर केमेस्ट्री सर
के किलाफ कोई कार्यवाही नहीं
की तो हम सब आपके विरूद्ध भी
शिकायत कर देंगे तथा मीडिया
और सोशल मीडिया में आपकी सारी
कहानी बयान कर देंगे।
अब
प्रिंसिपल डर गया और अभिभावकों
की जीत हुई। केमेस्ट्री सर
को कॉलेज से निकाला ही नहीं
गया बल्कि पुलिस के हवाले भी
कर दिया गया साथ ही साथ प्रिंसिपल
को भी उसके उदासीन रवैये की
सज़ा मिली।
जब
सब घर आये तो निधि माँ के गले
लग के खूब रोई और बोली- "माँ तुम कितनी
बहादुर हो, मैं
समझती थी तुम सारा दिन घर में
रहती हो तो तुम कुछ जानती ही
नहीं हो पर माँ मुझे तुम पर
गर्व है कि मैं तुम्हारी बेटी
हूँ"।
प्रकाश
ने भी मधुरा की तारीफ करते हुए
कहा "हाँ
मधुरा मैने भी हार मान ली थी
पर तुमने संघर्ष किया और जीत
भी गईं। सच में माँ बेटी का
रिश्ता ही एसा होता है, सबसे अलग"। पूरे
कमरे हँसी खिलखिलाहट की आवाज़
गूँजने लगी।
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